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Friday, June 16, 2017

KNOW ABOUT - Windows 10 में Downloads फ़ोल्डर से फ़ाइलों को ऑटोमेटिकली कैसे डिलीट करें

वेब से एक फ़ाइल डाउनलोड करते हैं, तब वह फ़ाइल डिफ़ॉल्ट रूप से डाउनलोड फ़ोल्डर में डाउनलोड की जाती है।

 वेब से सॉफ़्टवेयर और अन्य फ़ाइलों को डाउनलोड करते हैं, तो संभावना है कि आपके डाउनलोड फ़ोल्डर में कई GB के फ़ाइल्‍स और प्रोग्राम्‍स होंगे।

विंडोज में डाउनलोड फ़ोल्डर का डिफ़ॉल्ट लोकेशन C: \Users\UserName\Download होता हैं। जब इंटरनेट से बहुत कुछ डाउनलोड करते हैं, तो पीसी का C ड्राइव फुल हो जाता हैं, क्‍योकी  इस Download फ़ोल्डर में काफी डेटा जमा होता हैं।

Saturday, August 27, 2016

साइबर सुरक्षा के लिए कुछ टिप्स

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1. सबसे खतरनाक घातक वायरस सॉफ्टवेयर हैं ट्रोजन। यदि किसी भी साइबर अपराधी को आपके कंप्यूटर का आईपी एड्रेस पता हो. तो आसानी से वह आपके कंप्यूटर में अपने सिस्टम से ट्रोजन इंस्टाल कर सकता है। इसलिए किसी भी बहाने से अपना कंप्यूटर आईपी एड्रेस की जानकारी किसी को भी नहीं होने दें। 
2.  आम तौर पर हम अपना पासवर्ड छोटा रखते हैं, जो आसानी से हैक हो सकता है. प्रयास यह करें कि आपका जीमेल या याहू अकाउंट का पासवर्ड 14 डिजिट से अधिक बड़ा हो, क्योंकि पासवर्ड हैकिंग सॉफ्टवेयर से 14 डिजिट से बड़े पासवर्ड को हैक करना बेहद मुश्किल है।

Friday, June 5, 2015

मोडेम (MODEM- Modulator Demodulator)

जब इन्टरनेट को टेलीफोन लाइन के माद्यम से कनेक्ट करते हैं तो मोडेम की अवश्यकता होती हैं. यह कंप्यूटर में चल रहे इन्टरनेट ब्रोजर और इन्टरनेट सर्विस प्रदाता के बीच आवश्यक लिंक हैं. टेलीफोन लाइन पर एनालोग सिग्नल भेजा जा सकता हैं, जबकि कंप्यूटर डिजिटल सिग्नल देता हैं. अतः इन दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए मोडेम की अवश्यकता होती हैं, जो डिजिटल सिग्नल को एनालोग में और एनालोग सिग्नल को डिजिटल सिग्नल में रूपांतरित करता हैं. मोडेम के दोनों ओर कंप्यूटर ओर टेलीफोन लाइन से जुड़ा होना अवश्यक होता हैं. मोडेम से स्पीड को Bit Per Second (BPS), Kilobyte Per Second (KBPS), Megabyte Per Second (MBPS), में मापा जाता हैं.



मोडेम मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –

अ) इंटरनल (आंतरिक) मोडेम – ऐसा मोडेम जो डेस्कटॉप या लैपटॉप में अंदर से ही लगा होता हैं. ऐसा मोबाइल जिसमे हम इन्टरनेट का प्रयोग करते हैं, उसमे इसी प्रकार के मोडेम का इस्तेमाल किया जाता हैं.

इन्टरनेट के लिए आवश्यक उपकरण

कंप्यूटर पर इन्टरनेट शुरू करने से पहले हमें किन-किन चीजों की आवश्यकता होती हैं-

  1. – कंप्यूटर या मोबाइल (जो G.P.R.S सपोर्ट करता हो )
  2. – टेलीफोन या मोबाइल सीम कार्ड
  3. – मोडेम
  4. – सॉफ्टवेयर जिसके मदद से इंटरनेट पर काम किया जाता हैं.

कंप्यूटर या मोबाइल (जो G.P.R.S सपोर्ट करता हो ) - बाजार में मिलने वाले घरेलू उपयोग वाले सभी कंप्यूटर को इन्टरनेट से जोड़ा जा सकता हैं. अगर आप अपने मोबाइल में इन्टरनेट का उपयोग करना चाहते हैं तो मोबाइल लेने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना जरुरी हैं की वह मोबाइल फोन G.P.R.S सपोर्ट करता हैं या नहीं. बस जो फोन G.P.R.S सपोर्ट कर सकता हैं उसी में इन्टरनेट का उपयोग किया जा सकता हैं.


टेलीफोन या मोबाइल सीम कार्ड - कंप्यूटर दुवारा बनने वाले डिजिटल सिग्नल को टेलीफ़ोन लाइन वाले एनालोग सिग्नल के माद्यम से ही एक जगह से दूसरे जगह भेजा जाता हैं. इस कारण इन्टरनेट के इस्तेमाल के लिए एक फोन लाइन का होना अतिआवश्यक होता हैं. नया फोन लेते वक्त कुछ खास बातों पर ध्यान देना होता हैं –

– हम जिस कंपनी का फोन लेने जा रहे हैं वह इन्टरनेट सेवा प्रदान करता हैं या नहीं,

– कंपनी स्वयं मोडेम प्रदान करता हैं या नहीं

– कंपनी किस प्रकार का सेवा मुहैया करवाता हैं जैसे ब्रोड्बैंड, डायलअप, लीज्ड लाइन आदि.

– फोन प्रदाता कम्पनी किस प्रकार अपना बिल लेता हैं मसलन मासिक चार्ज कितना लेती हैं, उसमे कितना डाउनलोड्स मुफ्त मिलता हैं, अतरिक्त डाउनलोड होने पर चार्ज कितना लिया जाता हैं. आदि

मोबाईल में डिजिटल सिग्नल को टेलीफ़ोन लाइन वाले एनालोग सिग्नल के माद्यम से एक जगह से दूसरे जगह भेजने के लिए सीम कार्ड का उपयोग किया जाता हैं. मोबाईल में सीम कार्ड लेते वक्त ये जानकारी प्राप्त करना जरुरी होता हैं की सीम कार्ड वाली कंपनी इन्टरनेट सेवा देती हैं या नहीं, और देती हैं तो उसके चार्ज कितने होते हैं.


मोडेम– अगर फोन प्रदाता कंपनी आपको मोडेम प्रदान नहीं कर रहीं हैं तो आपको बाजार से मोडेम खरीदना होगा. यहाँ आपको इस बात पर ध्यान देना होगा की फोन सेवा देने वाली कंपनी अधिकतम कितने स्पीड का इन्टरनेट सेवा प्रदान करती हैं, उसी के आधार पर आपको मोडेम लेना पड़ता हैं.

मोबाईल फोन जिसमे G.P.R.S सुविधा होती हैं मोडेम आंतरिक तौर पर ही लगा होता हैं. इस कारण हम मोबाइल में तो इन्टरनेट उपयोग कर ही सकते हैं इसके साथ ही हम मोबाइल को कंप्यूटर से जोड़ कर फोन और मोडेम जैसा भी ऊपयोग कर सकते हैं.

इसके साथ ही बाजार में बहुत डेटा कार्ड भी उपलब्ध हैं जिसका उपयोग हम सीधे तौर पर मोडेम और टेलीफोन जैसा कर सकते हैं. इसमें भी मोबाईल जैसे टेलीफ़ोन और मोडेम दोनों का एक साथ उपयोग करने के लिए सीम कार्ड की जरुरत होती हैं.
 डेटा कार्ड भी मोबाइल जैसा मुख्यतः दो प्रकार का होता हैं

अ) GSM (ग्रुप स्पेशल मोबाइल )

ब) CDMA (कोड डिवीजन मल्टीपल एक्सेस)

सॉफ्टवेयर जिसके मदद से इंटरनेट पर काम किया जाता हैं-

इन्टरनेट पर काम करने के लिए एक विशेष प्रकार के अप्लीकेशन सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती हैं. जिसके उपयोग से ही हम इन्टरनेट पर काम कर सकते हैं. इस सॉफ्टवेयर की और अधिक जानकारी के लिए देखे – इन्टरनेट सॉफ्टवेयर या वेब ब्राउजर

जब उपरोक्त सभी सामग्री उपलब्ध हो जाय तब ही इन्टरनेट प्रारम्भ करना सम्भव हो सकता हैं.

Thursday, June 4, 2015

डी.ओ.स. –डोस (डिस्क ऑप्रेटिंग सिस्टम)

वैज्ञानिकों के अलावा साधारण उपभोक्ताओं के लिये एक ऑपरेटिंग सिस्टम की शुरुआत की गयीं जिसका नाम डी.ओ.स. –डोस (डिस्क ऑप्रेटिंग सिस्टम) रखा गया. यह ऑप्रेटिंग सिस्टम कंसोल मोड आधारित था, अर्थात इसमें माउस का उपयोग नहीं होता था न ही इसमें ग्राफ़िक से सम्बंधित कोई काम हो सकता था. इसमें फाइल और डायरेक्टरी बनाया जा सकता था जिसमे हम टेक्स्ट को सुरक्षित कर के रख सकते थे और पुनः उपयोग भी कर सकते थे.

डी.ओ.स. पूर्णतः आदेश (COMMAND) पर आधारित होता था. आदेश के दुवारा ही कंप्यूटर को निर्देशित कर सकते थे. जिन्हें जितना आदेश याद होता था उसे उतना ही जानकार माना जाता था. आदेश (COMMAND)- यह कंप्यूटर को निर्देशित करने का तरीका होता हैं. पहले ही कंप्यूटर को यह बतला दिया जाता है की निम्न शब्द का प्रयोग करने से निम्न प्रकार का ही काम करना हैं. और जब कोई उपभोक्ता बस उस आदेश को लिखता हैं तो कंप्यूटर स्वतः उस काम को निष्पादित करता हैं.

कम्प्यूटर वायरस


VIRUS – Vital Information Resources Under Seized

यह नाम बीमारी वाले वायरस से पूर्णतः अलग होते है.वायरस प्रोग्रामों का प्रमुख उददेश्य केवल कम्प्यूटर मेमोरी में एकत्रित आंकड़ों व संपर्क में आने वाले सभी प्रोग्रामों को अपने संक्रमण से प्रभावित करना है ।वास्तव में कम्प्यूटर वायरस कुछ निर्देशों का एक कम्प्यूटर प्रोग्राम मात्र होता है जो अत्यन्त सूक्षम किन्तु शक्तिशाली होता है । यह कम्प्यूटर को अपने तरीके से निर्देशित कर सकता है । ये वायरस प्रोग्राम किसी भी सामान्य कम्प्यूटर प्रोग्राम के साथ जुड़ जाते हैं और उनके माध्यम से कम्प्यूटरों में प्रवेश पाकर अपने उददेश्य अर्थात डाटा और प्रोग्राम को नष्ट करने के उददेश्य को पूरा करते हैं । अपने संक्रमणकारी प्रभाव से ये सम्पर्क में आने वाले सभी प्रोग्रामों को प्रभावित कर नष्ट अथवा क्षत-विक्षत कर देते हैं । वायरस से प्रभावित कोई भी कम्प्यूटर प्रोग्राम अपनी सामान्य कार्य शैली में अनजानी तथा अनचाही रूकावटें, गलतियां तथा कई अन्य समस्याएं पैदा कर देता है ।प्रत्येक वायरस प्रोग्राम कुछ कम्प्यूटर निर्देशों का एक समूह होता है जिसमें उसके अस्तित्व को बनाएं रखने का तरीका, संक्रमण फैलाने का तरीका तथा हानि का प्रकार निर्दिष्ट होता है । सभी कम्प्यूटर वायरस प्रोग्राम मुख्यतः असेम्बली भाषा या किसी उच्च स्तरीय भाषा जैसे “पास्कल” या “सी” में लिखे होते हैं ।

वायरस के प्रकार 

1. बूट सेक्टर वायरस
2. फाइल वायरस

कंप्यूटर बूटिंग


कंप्यूटर को ऑन/ऑफ करने की प्रक्रिया को बूटिंग के नाम से जाना जाता है. यह प्रत्येक कंप्यूटर के सबसे पहली प्रक्रिया होती हैं. एक पर्सनल कंप्यूटर में सामान्यतः केंद्रीय प्रसंस्करण इकाई (सीपीयू) के डब्बे में ऑन/ऑफ का बटन होता है जिसे दबा कर हम कंप्यूटर को बूट करते हैं.

बूटिंग दो प्रकार के होते हैं-

१) कोल्ड बूटिंग

२) वार्म बूटिंग

ऑन/ऑफ बटन दबा कर कंप्यूटर को खोलने की क्रिया को कोल्ड बूटिंग कहा जाता हैं. अगर कंप्यूटर खुल गया हो परन्तु ऑफ न हो रहा हो या कोई प्रोग्राम फस गया हो तो कंप्यूटर को की-बोर्ड के Alt+Ctrl+Del दबा कर या फिर रिस्टार्ट बटन का उपयोग कर कंप्यूटर को बंद किया जाता हैं, यह प्रक्रिया को वार्म बूटिंग के नाम से जाना जाता है.

कंप्यूटर और विद्युत धारा

बिना विद्युत धारा के कंप्यूटर की कल्पना भी नहीं की जा सकती हैं. विद्युत धारा प्रवाह के कंप्यूटर मे दो प्रकार के उपयोग होते हैं. एक शक्ति स्रोत के रूप मे और दूसरा परिचालन संकेत के रूप में. शक्ति स्रोत के रूप मे विद्युत धारा इसके विभिन्न ऑपरेटिंग सिस्टमों की मोटरों का परिचालन करती हैं. सामन्यतः यह कार्य १२ वोल्ट पर संपादित होते हैं. कंप्यूटर द्वारा इस्तेमाल विद्युत धारा शक्ति का अधिकतम भाग इसी कार्य में खपत होता है. कंप्यूटर में विद्युत धारा का दूसरा कार्य अधिक महत्वपूर्ण हैं, यद्यपि इसमें विद्युत शक्ति की मामूली सी मात्रा ही उपयुक्त होती हैं. यह कार्य कंप्यूटर की कार्य प्रणाली के अनुसार संकेतों का उत्पादन करना हीं. इन्ही संकेतों के आधार पर कंप्यूटर सभी प्रकार के कार्य को सम्पन करता हैं. सामन्यतः यह कार्य ३-५ वोल्ट पर संपादित होते हैं.

कंप्यूटर लोजिक (तर्क शस्ति)

कंप्यूटर लोजिक (तर्क शस्ति)


बोध के उपयोग की प्रक्रीया को लोजिक कहा जाता हैं. कंप्यूटर तंत्र के सॉफ्टवेर कंप्यूटर की बोध-तंत्र होते है जो वस्तुतः कार्यक्रम एवं क्रिया अनुक्रिया के दिशा निर्देश होते हैं. इन्हीं के अनुसार कंप्यूटर तंत्र कार्य करते हैं. इन दिशा निर्देशों के अनुपालन हेतु कंप्यूटर विद्युत संकेतों का उपयोग करते हैं. विद्युत संकेतों एवं सूचनाओ के द्विदिशी संपरिवर्तन को कंप्यूटर लोजिक कहा जाता हैं. दो प्रकार के कंप्यूटर लोजिक का उपयोग होता है जिन्हें अनुवर्ती / एनालोग तथा अंकीय / डिजिटल लोजिक कहा जाता हैं.

अनुवर्ती / एनालोग तर्क शस्ति/ लोजिक मे सूचना के परिणाम एवं उसके आवर्तन का यथावत निरूपण होता है. अतः कंप्यूटर तन्त्र मे विद्युत संकेत का परिणाम सूचना के परिणाम के समानुपाती होता है. एनालोग लोजिक के विद्युत संकेत सूचना उपलब्द्धि के समय से उसके परिणामस्वरूप अनवरत होते है. अंकीय लोजिक मे विद्युत संकेत अनवरत न हो कर उर्मियों के स्वरुप मे एक सुनिश्चित आवृत्ति पर अथवा सुनिश्चित अवधि के लिये उपस्तिथ होते हैं.

कंप्यूटर भाषा (COMPUTER LANGUAGES)



अपनी बातों को दूसरे के साथ एकदम सटीक तरीके से समझाने का माध्यम ही भाषा कहलाता है. हम कंप्यूटर से भी बात करते हैं मतलब हम कंप्यूटर को निर्देशित करते हैं और इस निर्देसन के लिए हम जिस भाषा का प्रयोग करते है वो कंप्यूटर भाषा के तौर पर जाना जाता हैं. कंप्यूटर केवल विद्युत धारा के चालू या बंद, ० या १ मे अंकित भाषा ही समझ सकता है इन्हें बिट Binary Digit कहा जाता है. अतः कंप्यूटर से यदि कोई कार्य समपन्न करना है तो इसी भाषा मे समादेश तथा सूचनाएं देनी होती है. शुरुआती दौर में कागज के कार्डों में छिद्र करके कंप्यूटरों को निर्देश दिए जाते थे.

कंप्यूटर भाषाओं के निम्न प्रकार होते हैं-

१. मशीनी भाषा (Machine Language, Low Level Language, LLL)

२. संयोजन भाषा (Assembly Language, Middle Level Language, MLL)

३. उच्च स्तरीय भाषा (High Level Language, HLL)

मशीनी भाषा – कंप्यूटरों के विकास के बाद उनसे संवाद स्थापना के लिए अनुदेश बाइनरी सिस्टम मे ही अंकित किये जाते थे. इससे मशीन से सीधे संपर्क होता हैं, इसलिए इसे मशीनी भाषा कहा जाता हैं. कंप्यूटर मूलतः केवल यही भाषा समझता है. आज भी कंप्यूटर से संपर्क करने लिए हम इसी भाषा का प्रयोग करते है मगर काम करने वालो को इसका आभास नहीं हो पाता है. उपयोगकर्ता तथा कंप्यूटर के बीच प्रयुक्त भाषाएँ तथा प्रोग्राम इस कार्य को संपन्न करते रहते है. उदाहरण –

अगर हम Keyboard से ‘A’ टाइप करते हैं तो कंप्यूटर पहले उसके लिए पूर्व से निर्धारित ASCII संख्या =65 पहचानती है और फिर उससे मशीनी भाषा मे बदलती है. A = 65 = 1000001 मे बदलती हैं तब हमें एक आकृति प्राप्त होती है जो A होती हैं. यह सारी प्रक्रिया एक सेकंड के १००००० हिस्से मे होती है इस कारण हमें पता नहीं चलता.

मशीनी भाषा की समस्याएं- ० और १ मे कंप्यूटर को बार बार समझाने की प्रक्रीया आसान नहीं होती. अगर हमें कोई जटिल गणनाओं की आवश्यकता हो तो लिखने मे समस्या आ जाएगी.

संयोजन भाषा – ० और १ मे कंप्यूटर को बार बार समझाने की प्रक्रीया आसान नहीं होती इससे भाड़ी तनाव की स्थिति उत्पन होती है. इस तनाव से मुक्ति के लिए विशेषज्ञओ ने सांकेतिक भाषाओं का अविष्कार किया. उन्होंने प्रत्येक प्रक्रीया के लिए एक सरल शब्द को चुन लिया. ये शब्द मशीनी भाषा के ही पर्याय मान लिये गए. इन शब्दों से निर्मित भाषाओं को संयोजन भाषा कहा जाता हैं. इन शब्दों को पुनः कंप्यूटर को मशीनी भाषा मे समझाने के लिये असेम्ब्लेर का उपयोग किया जाता है. उदाहरण –

अगर हमे शीर्षक प्रारम्भ करना है तो SOH कमांड का प्रयोग किया जाता. जब भी कंप्यूटर पर नया शीर्षक की आवश्यकता होती वहाँ इस कमांड के उपयोग से कंप्यूटर समझ जाता की उसे अब नया शीर्षक बनाने का काम करना हैं. मशीनी भाषा मे कंप्यूटर को यह बात बतलाने के लिये ०,१,०,१,१,० जैसा एक लंबा लाइन लिखना पड़ता था.

संयोजन भाषा की समस्याएं- एक बार लिखे गए प्रोग्राम को बदलने मे समस्या उत्पन्न होती थी. इस भाषा मे प्रोग्राम लिखने के लिये प्रोग्रामर को उस मशीन की हार्डवेयर की भी जानकारी रखनी पड़ती थी जिसमे वो प्रोग्राम चलता.

उच्च स्तरीय भाषा – कंप्यूटर का व्यावसायिक उपयोग बढ़ाने के साथ एक नया समस्या सामने आया. हरेक व्यावसायिक कंप्यूटर उपयोगकर्ता को अपने व्यवसाय के अनुसार प्रोग्राम की आवश्यकता होने लगी. परन्तु कंप्यूटर कार्य प्रणाली को जानने वालों की संख्या बहुत ही सिमित थी. अचानक बड़ी संख्या मे विशेषज्ञ प्रोग्रामरों को तेयार करना संभव नहीं था. अतः विशेषज्ञ प्रोग्रामरो ने एक और भी आसान भाषा का विकास किया जिसे उच्च स्तरीय भाषा कहा गया. इस भाषा के अंतर्गत की-वर्ड का निर्माण किया गया. जो साधारण इंग्लिश शब्दों से मिलता था. इस कारण इसे आसानी से याद भी रखा जा सकता था. इसके उपयोग के लिये कंप्यूटर कार्य प्रणाली की जानकारी आवश्यक नहीं रह गया. उच्च स्तरीय भाषा को मशीनी भाषा मे कंप्यूटर को समझाने के लिये इंटर-प्रेटर की आवश्यकता होती है. C, C++, C#, FORTAN, PASCAL, ORACLE आदि इसके उदाहरण है.